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नवरात्र में माँ दुर्गा के आगमन व गमन वाहन

What is the significance of आगमन and गमन वाहन of माँ दुर्गा? And how is it known? शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे। गुरौ शुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकीर्त्तिता।। अर्थात्- सोमवार या रविवार को घट स्थापना होने पर मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं। शनिवार या मंगलवार को देवी का वाहन घोड़ा होता है। गुरुवार या शुक्रवार को नवरात्रि शुरू होने पर देवी डोली में बैठकर आती हैं। बुधवार से नवरात्रि शुरू होने पर मां दुर्गा नाव पर सवार होकर आती हैं। देवी के आगमन के वाहन से शुभ-अशुभ का विचार किया जाता है। माता दुर्गा जिस वाहन से पृथ्वी पर आती हैं, उसके अनुसार आगामी छह माह में होने वाली घटनाओं का आंकलन किया जाता है। इसके लिए भी देवी भागवत पुराण में एक श्लोक है- गजे च जलदा देवी क्षत्र भंग स्तुरंगमे। नौकायां सर्वसिद्धिस्या दोलायां मरणंधुवम्।। अर्थात्- देवी जब हाथी पर सवार होकर आती है तो वर्षा ज्यादा होती है। घोड़े पर आती हैं तो पड़ोसी देशों से युद्ध की आशंका बढ़ जाती है। देवी नौका पर आती हैं तो सभी के लिए सर्वसिद्धिदायक होता है और डोली पर आती हैं तो किसी महामारी से मृत्यु का भय बना रहता हैं। माता दु...

मंदिर व उनके स्थापत्य

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मंदिर निर्माण की कला सदियों पुरानी है। वैदिक काल से ही मंदिरों के वर्णन मिलते हैं। देवालय, कोविल, देओल, देवस्थानम्, प्रसाद आदि अनेक नामों से विदित मंदिर अनेक तरह से निर्मित किये जाते हैं। मंदिर निर्माण के पुर्ववर्ती 3 प्रकार थे: १.संधर (प्रदक्षिणा पथ) २.निरंधार (प्रदक्षिणा पथ के बिना) ३.सर्वतोभद्र (सभी दिशाओं से प्रवेश किया जा सके) इस काल के कुछ प्रमुख मन्दिरों में है देवघर (यूपी) का मंदिर, उदयगिरी(एमपी) आदि!सनातन मंदिर के मुख्य स्वरुप: गर्भगृह(देवता का निवास) मण्डप(प्रवेश कक्ष जोकि काफी बड़ा होता है) पूर्वोतर काल में इन पर शिखर बनाये जाने लगे जिन्हेशिखर उत्तर भारत में व विमान दक्षिण भारत में कहा जाता है। वाहन अर्थात मंदिर के अधिष्ठाता देवता की सवारी। ये स्तम्भ या ध्वजा के साथ गर्भगृह के साथ कुछ दूरी पर रखा जाने लगा। भारत के मंदिरों को मुख्यत: दो शैलियों में बाँटा जाता है: उत्तर की नागर व दक्षिण की द्रविड़। वेसर शैली इन दोनों शैलियों का मिश्रण है जिसमें नागर और द्रविड़ की चुनी हुई विशेषताएँ होती हैं। नागर शैली के मंदिरों में मुख्य द्वार पर गंगा यमुना जैसी नदियों को दिखाया जाता था व द्र...

श्रीरामरक्षास्त्रोतम्

संग सखीं सब सुभग सयानीं। गावहिं गीत मनोहर बानीं॥ सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा॥ (227।2) साथ में सब सुंदरी और सयानी सखियाँ हैं, जो मनोहर वाणी से गीत गा रही हैं। सरोवर के पास गिरिजाजी का मंदिर सुशोभित है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, देखकर मन मोहित हो जाता हैएक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥ तेहिं दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥4 एक सखी सीताजी का साथ छोड़कर फुलवाड़ी देखने चली गई थी। उसने जाकर दोनों भाइयों को देखा और प्रेम में विह्वल होकर वह सीताजी के पास आई।देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए॥ स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥1 दो राजकुमार बाग देखने आए हैं। किशोर हैं और सब प्रकार से सुंदर हैं। वे साँवले और गोरे हैं, उनके सौंदर्य को मैं कैसे बखानकर कहूँ। वाणी बिना नेत्र की है और नेत्रों के वाणी नहीं हैतासु बचन अति सियहि सोहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने॥ चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई॥4 उसके वचन सीताजी को अत्यन्त ही प्रिय लगे और दर्शन के लिए उनके नेत्र अकुला उठे। उसी प्यारी सखी को आगे करके सीताजी च...

श्री सिया-राम का प्रथम मिलन

संग सखीं सब सुभग सयानीं। गावहिं गीत मनोहर बानीं॥ सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा॥ (227।2) साथ में सब सुंदरी और सयानी सखियाँ हैं, जो मनोहर वाणी से गीत गा रही हैं। सरोवर के पास गिरिजाजी का मंदिर सुशोभित है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, देखकर मन मोहित हो जाता हैएक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥ तेहिं दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥4 एक सखी सीताजी का साथ छोड़कर फुलवाड़ी देखने चली गई थी। उसने जाकर दोनों भाइयों को देखा और प्रेम में विह्वल होकर वह सीताजी के पास आई।देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए॥ स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥1 दो राजकुमार बाग देखने आए हैं। किशोर हैं और सब प्रकार से सुंदर हैं। वे साँवले और गोरे हैं, उनके सौंदर्य को मैं कैसे बखानकर कहूँ। वाणी बिना नेत्र की है और नेत्रों के वाणी नहीं हैतासु बचन अति सियहि सोहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने॥ चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई॥4 उसके वचन सीताजी को अत्यन्त ही प्रिय लगे और दर्शन के लिए उनके नेत्र अकुला उठे। उसी प्यारी सखी को आगे करके सीताजी च...

शिव-पार्वती विवाह

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"हे दुर्गे, तुम्हें अपनी वामांगी बनाते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी। हे शिवे, मेरी हो जाओ और मेरी अर्धांगनी बन कैलाश आओ।" "महादेव, आपसे विवाह करना ही मेरा इस रुप में अवतरण का ऊद्देश्य है। परंतु हे त्रिलोचन, कृपा कर मेरे पिता को विवाह प्रस्ताव भेजें।" "भवानी, ऐसा ही होगा।" वर्षों की तपस्या पूर्ण कर माँ पार्वती औशाढ़ीप्रष्थ लौट गई। गिरिराज हिमवंत, गिरिजाया मेनावती और गंगा यमुना ने उनका स्वागत किया। उधर कैलाश पर महादेव ने सप्तर्षियों को बुला उन्हें कहा, "हे सप्तर्षियों, परब्रह्म होते हुए मेरा गिरिराज हिमवंत के यहाँ जा उनकी पुत्री का हाथ माँगना उचित नहीं। अतएव आप सब वहाँ मेरा और पार्वती का विवाह प्रस्ताव लेकर जाए।" गिरिराज हिमवंत ने सप्तर्षियों का यथोचित सत्कार किया व आने का कारण पूछा। स्वयंभू शिव की आज्ञानुसार सप्तर्षियों ने हिमवंत के समक्ष शिव-पार्वती विवाह का प्रस्ताव रखा। "गिरिराज, देवाधीदेव महादेव आपकी पुत्री पार्वती देवी से विवाह करना चाहते हैं।" "हे सप्तर्षियों, ये मेरा सौभाग्य है की महेश्वर ने मुझे इस योग्य समझा। इस विवाह को ...

Àsurās, Dàityās, Dānavas and Rākshas

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All the species in the world are born from Rişi Kàshyapa and his wives. The son of Sri Brahma ji Kashyapa ji is a Sàptarişi . According to Vishnū Pūrān he married thirteen daughters of Prajapatī. They were Aditi, Diti, Kadru, Danu, Arishta, Surasa, Surabhi, Vinata, Tamra, Krodhavasa, Ida, Khasa and Muni. From these wives took birth different species, humans and humanoids. From Ādīti were borns twelve sobs called the " Āditays ", Aṃśa, Aryaman, Bhaga, Dhūti, Mitra, Pūṣan, Śakra, Savitṛ, Tvaṣṭṛ, Varuṇa, Viṣṇu, and Vivasvat or Vivasvan. From Dīti were born the "Dàityās" Hiranyakashipu and Hiranyaksha and a daughter Sinhika. Danu gave birth to Dānvās. Other were Nāgās, Garūdas, Apsarās etc. Now coming to the point differentiating them, i.e, Àsūra, Dàitya, Dānav, Rākshas. Àsūra as the name suggests is basically a trait, like anyone who hates Sūra. सुरान् क्षिपती इति असुर:। One who hates the Sūras. Anyone can be an Àsūra a Dàitya, Dānav, even a Human. A Dàitya is a spec...

𝕮𝖍𝖎𝖓𝖙𝖆𝖒𝖆𝖓𝖎 𝕲𝖗𝖎𝖍𝖆 : 𝕿𝖍𝖊 𝖆𝖇𝖔𝖉𝖊 𝖔𝖋 𝕽ā𝖏𝖗ā𝖏𝖊𝖘𝖍𝖜𝖆𝖗ī

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thread#showTweet" data-screenname="viigyaan" data-tweet="1313373957110677506" dir="auto" style="box-sizing: border-box; font-family: lato, sans-serif; font-size: 1.5rem; line-height: 1.5; letter-spacing: -0.003em; margin-bottom: 20px; overflow-wrap: break-word; color: rgb(0, 0, 0); cursor: pointer; transition: all 0.3s ease 0s; padding-top: 20px;">The abode of the Mother Divine, 𝕮𝖍𝖎𝖓𝖙𝖆𝖒𝖆𝖓𝖎 𝕲𝖗𝖎𝖍𝖆, is a place beyond imagination for a mortal. Being the abode of the Empress of the three lokAs it is inexplicably divine. thread#showTweet" data-screenname="viigyaan" data-tweet="1313373962244554752" dir="auto" style="box-sizing: border-box; font-family: Georgia, Cambria, "times new roman", Times, serif; font-size: 18px; line-height: 1.58; letter-spacing: -0.003em; margin-bottom: 1.25rem; overflow-wrap: break-word; color: rgb(0, 0, 0); cursor: pointer; transition: all 0.3s ease 0s;...