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Showing posts from December, 2024

लोक आस्था का महापर्व : छठ

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 वैसे तो छठ पूजा मुख्यतः रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है परन्तु विगत कुछ वर्षों में इसके सरल स्वरूप, मनोहर विधि-विधान एवं इसके सुन्दर रीतियों ने इसे इतना लोकप्रिय कर दिया है की आज सभी को इसके विषय में जानने एवं इसमें सम्मिलित होने की इच्छा होती है. षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ पूजा सूर्य उपासना का अनुपम लोकपर्व है। छठ कदाचित षष्ठ/षष्ठी शब्द से विकृति के कारन बना है. पुराणों आदि जहाँ भी इस पर्व की कथा या इसका भाव दृश्य होता है वो षष्ठी नाम से ही होता है. लोग अलग-अलग कारणों से छठ पूजा मनाते हैं या व्रत रखते हैं, लेकिन मुख्य कारण सूर्य देव की पूजा करना और उनका आशीर्वाद मांगना है। सूर्य देव व् छठी मैया से स्वास्थ, सन्तान, धन-धान्य की प्रार्थना की जाती है. छठ पूजा के लिए बिहार एवं उत्तर प्रदेश के लोग में विशेष आस्था व् आदर है. ये लगाव कई बार इससे भी दृश्य होता है की छठ पूजा पर अपने शहर अपने गाँव जाने वालों की संख्या लाखों में हमें दिखाई देती है. छठ विशेष रूप से वर्ष में दो बार मनाया जाता है. इसमें मुख...

अच्युत अनंत गोविंद

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  ... उस मुहूर्तमें सबसे पहले कालकूट नामक महाभयंकर विष प्रकट हुआ, जो बहुत बड़े पिण्डके रूपमें था । वह प्रलयकालीन अभिके समान अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था । उसे देखते ही सम्पूर्ण देवता और दानव भयसे व्याकुल हो भाग चले। उन्हें भयसे पीडित हो भागते देख मैंने उन सबको रोककर कहा – 'देवताओ ! इस विषसे भय न करो। इस कालकूट नामक महान् विषको मैं अभी अपना आहार बना लूँगा।'  मेरी बात सुनकर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता मेरे चरणोंमें पड़ गये और 'साधु साधु' कहकर मेरी स्तुति करने लगे। उधर मेघके समान काले रंगवाले उस महाभयानक विषको प्रकट हुआ देख मैंने एकाग्रचित्तसे अपने हृदयमें सर्वदुःखहारी भगवान् नारायणका ध्यान किया और उनके तीन नामरूपी महामन्त्रका भक्तिपूर्वक जप करते हुए उस भयंकर विषको पी लिया । सर्वव्यापी श्रीविष्णु के तीन नामोंके प्रभावले उस लोकसंहारकारी विषको मैंने अनायास ही पचा लिया।  अच्युत, अनन्त और गोविन्द - ये ही श्रीहरिके तीन नाम हैं जो एकाग्रचित्त हो इनके आदिमें प्रणव और अन्तमें नमः जोड़कर ( ॐ अच्युताय नमः, ॐ अनन्ताय नमः तथा ॐ गोविन्दाय नमः इस रूप में ) भक्तिपूर्वक जप करता है, उसे विष, र...

हनुमन्नाटक - श्री हनुमान जी द्वारा रचित रामकथा

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कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं पावनं पावनानां पाथेयं यन्मुमुक्षोः सपदि परपदप्राप्तये प्रस्थितस्य। विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं सज्जनानां बीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम।।१।। भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी गुणावलीको वर्णन करनेके अभिलाषी ग्रन्थ- कार अपने इष्टदेव का नामस्मरणरूप मङ्गलाचरण करते हैं जिसमें सकल कल्याण भरे हैं, जो कलियुगमें स्मरण करनेवालों के सकल पापको हर लेता है, जो एकही वाल्मीकि आदि कविवरोकी वाणियोंके विश्राम पानेका स्थान है. जो त्रिलोकीको पवित्र करने वालोंको भी पवित्र करनेवाला है, जो शीघ्र ही परब्रह्ममें स्थानको (परम पदको ) पानेके लिये प्रस्थान करने वाले (उद्योग करनेवाले ) मुमुक्षु पुरुषको मार्गका सहारा है ( अर्थात् मोक्षको चाहने वाले पुरुष साधनके समय में जिस रामनाम के सहारे से अनायास ही परमपदको पाजाते हैं) और जो धर्मरूपी वृक्षका बीज है (अर्थात् जैसे किसी वृक्ष के बीजम उसके पुष्प फल आदि सब विद्यमान होते हैं तैसेडी इस धर्मरूपी वृक्ष के बीजरूप रामनाम धर्मके सब अङ्ग विद्यमान हैं, क्यों...

𝑺𝒓𝒊 𝑴𝒖𝒌𝒂 𝑺𝒂𝒏𝒌𝒂𝒓𝒆𝒏𝒅𝒓𝒂 𝑺𝒂𝒓𝒂𝒔𝒘𝒂𝒕𝒉𝒊 (𝑴𝒐𝒐𝒌𝒂 𝑲𝒂𝒗𝒊).

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Here I share the divine story of 𝑺𝒓𝒊 𝑴𝒖𝒌𝒂 𝑺𝒂𝒏𝒌𝒂𝒓𝒆𝒏𝒅𝒓𝒂 𝑺𝒂𝒓𝒂𝒔𝒘𝒂𝒕𝒉𝒊 (𝑴𝒐𝒐𝒌𝒂 𝑲𝒂𝒗𝒊). Svāmī was the 20th śaṃkarācārya of Kāmakotī peetham. His Holiness was born with the Purvashrama name of Sankara to the erudite astronomer mathematician of Kanchipuram, Aataviira and his Dharmapatni Vidyavathi. His Holiness was born with the Purvashrama name of Sankara to the erudite astronomer mathematician of Kanchipuram, Aataviira and his Dharmapatni Vidyavathi. He was born congenitally speech and hearing impaired and dedicated his life performing various chores in the Kamakshi temple at Kanchipuram. On one such night, as the legend goes, Sankara was accidentally left locked in the temple. Goddess Kamakshi, who strolls around the temple, attending to the needs of her children every night, showers her compassionate gaze of knowledge on the scared Sankara. Spontaneously words erupt as immortal fountains from His blessed mouth. 500 verses of emotional outpouring on the div...