अच्युत अनंत गोविंद
... उस मुहूर्तमें सबसे पहले कालकूट नामक महाभयंकर विष प्रकट हुआ, जो बहुत बड़े पिण्डके रूपमें था । वह प्रलयकालीन अभिके समान अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था । उसे देखते ही सम्पूर्ण देवता और दानव भयसे व्याकुल
हो भाग चले। उन्हें भयसे पीडित हो भागते देख मैंने उन सबको रोककर कहा – 'देवताओ ! इस विषसे भय न
करो। इस कालकूट नामक महान् विषको मैं अभी अपना आहार बना लूँगा।'
मेरी बात सुनकर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता मेरे चरणोंमें पड़ गये और 'साधु साधु' कहकर मेरी स्तुति करने लगे। उधर मेघके समान काले रंगवाले उस महाभयानक विषको प्रकट हुआ देख मैंने एकाग्रचित्तसे अपने हृदयमें सर्वदुःखहारी भगवान् नारायणका ध्यान किया और उनके तीन नामरूपी महामन्त्रका भक्तिपूर्वक जप करते हुए उस भयंकर विषको पी लिया । सर्वव्यापी श्रीविष्णु के तीन नामोंके प्रभावले उस लोकसंहारकारी विषको मैंने अनायास ही पचा लिया।
अच्युत, अनन्त और गोविन्द - ये ही श्रीहरिके तीन नाम हैं जो एकाग्रचित्त हो इनके आदिमें प्रणव और अन्तमें नमः जोड़कर ( ॐ अच्युताय नमः, ॐ अनन्ताय नमः तथा ॐ गोविन्दाय नमः इस रूप में ) भक्तिपूर्वक जप करता है, उसे विष, रोग और अग्रसे होनेवाली मृत्युका महान् भय नहीं प्राप्त होता । जो इस तीन नामरूपी महामन्त्रका एकाग्रतापूर्वक जप करता है, उसे काल और मृत्युसे भी भय नहीं होता; फिर दूसरोंसे भय दोनेकी तो बात ही क्या है। देवि ! इस प्रकार मैंने तीन नामके ही प्रभावसे विषका पान किया था।
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अच्युतानन्त गोविन्द इति नामत्रयं हरेः ।
यो जपेत्प्रयतो भक्त्या प्रणवार्थ नमोऽन्तकम् ॥
तस्य मृत्युभयं नास्ति विपरोगानिजं महत् ।
नामत्रयं महामन्त्र जपेद्यः प्रयतात्मवान् ॥
कालमृत्युभयं चापि तस्य नास्ति किमन्यतः |

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